कोपियों के आख़री पन्नों पर, कभी कभी
कुछ दबे हुए अरमान ज़िंदा होते थे ।
कमबख़्त entrance exam की होड़ ने,
कोपियों को भी साँस लेने की फ़ुरसत ना दी।
कुछ दबे हुए अरमान ज़िंदा होते थे ।
कमबख़्त entrance exam की होड़ ने,
कोपियों को भी साँस लेने की फ़ुरसत ना दी।
Engineer बना promotion भी मिले,
फक्र आज भी मगर उन्हीं teams पर हैं,
जहां भरोसे और हौसलों के ईनाम में मैंने
इन्सानों को खिलते और पनपते देखा।
फक्र आज भी मगर उन्हीं teams पर हैं,
जहां भरोसे और हौसलों के ईनाम में मैंने
इन्सानों को खिलते और पनपते देखा।
ऐसा नहीं है कि मैंने धोख़े नहीं खायें,
पर इन्सानों की क्षमता से विश्वास उठ न सका।
इसी विश्वास की चिंगारी को आग बनाने चला हूँ
मेरे अरमान, इंसानियत के अरमानों से जुदा तो नहीं?
पर इन्सानों की क्षमता से विश्वास उठ न सका।
इसी विश्वास की चिंगारी को आग बनाने चला हूँ
मेरे अरमान, इंसानियत के अरमानों से जुदा तो नहीं?
बहुत अरसे बाद कुछ लिखा ....
हिंदी और उर्दू, कुछ भूल सी गया हूँ।
शब्दों को खोज रहा था ...
एहसास बता पाने के लिए

हिंदी और उर्दू, कुछ भूल सी गया हूँ।
शब्दों को खोज रहा था ...
एहसास बता पाने के लिए

