#श्रृंखला
- धर्मग्रंथोंमें वर्णित गंगाजीकी महिमा :
• ऋग्वेद : इसके प्रसिद्ध नदीसूक्तमें सर्वप्रथम गंगाजीका आवाहन तथा स्तुति की गई है ।
•पद्मपुराण : श्रीविष्णु सर्व देवताओंका प्रतिनिधित्व करते हैं तथा गंगाजी श्रीविष्णुका ! इसमें गंगाजीकी महिमा वर्णित करते हुए कहा कि पिता ,
- धर्मग्रंथोंमें वर्णित गंगाजीकी महिमा :
• ऋग्वेद : इसके प्रसिद्ध नदीसूक्तमें सर्वप्रथम गंगाजीका आवाहन तथा स्तुति की गई है ।
•पद्मपुराण : श्रीविष्णु सर्व देवताओंका प्रतिनिधित्व करते हैं तथा गंगाजी श्रीविष्णुका ! इसमें गंगाजीकी महिमा वर्णित करते हुए कहा कि पिता ,
पति , मित्र एवं आप्तजनोंके व्यभिचारी , पतित , दुष्ट , चांडाल तथा गुरुघाती होनेपर क्रमशः पुत्र , पत्नी , मित्र एवं आप्तजन उन्हें त्याग देते हैं , परंतु गंगाजी उन्हें कभी भी नहीं त्यागतीं ।
• महाभारत : ' गङ्गासदृशं तीर्थ न देव:केशवात् पर:।
ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति एवमाह पितामहः।।
~ महाभारत पर्व ३,
अध्याय ८३,श्लोक ९६
• श्रीमद्भगवद्गीता : भगवान श्रीकृष्णने अर्जुन को
( अध्याय १० , श्लोक ३१ में )
विभूतियोग बताते हुए कहा ' स्रोतसामस्मि जाह्नवी । ' , अर्थात -
ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति एवमाह पितामहः।।
~ महाभारत पर्व ३,
अध्याय ८३,श्लोक ९६
• श्रीमद्भगवद्गीता : भगवान श्रीकृष्णने अर्जुन को
( अध्याय १० , श्लोक ३१ में )
विभूतियोग बताते हुए कहा ' स्रोतसामस्मि जाह्नवी । ' , अर्थात -
सभी प्रवाहों में मै गंगा हूँ ।
•समस्त संप्रदायोंमें वंदनीय : भारतमें सकल संत , आचार्य एवं महापुरुष , तथा समस्त संप्रदायोंने गंगाजलकी पवित्रताको मान्यता दी है । शिव जी ने गंगा जीको मस्तकपर धारण किया ,इसलिए शैवोंको एवं विष्णुके चरणकमलोंसे गंगाजीके उत्पन्न होनेसे वैष्णवोंको वे ,
•समस्त संप्रदायोंमें वंदनीय : भारतमें सकल संत , आचार्य एवं महापुरुष , तथा समस्त संप्रदायोंने गंगाजलकी पवित्रताको मान्यता दी है । शिव जी ने गंगा जीको मस्तकपर धारण किया ,इसलिए शैवोंको एवं विष्णुके चरणकमलोंसे गंगाजीके उत्पन्न होनेसे वैष्णवोंको वे ,
परमपावन प्रतीत होती है शाक्तोंने भी गंगाजीको आदिशक्तिका एक रूप मानकर उनकी आराधना की है।
- महापुरुषोंद्वारा की गई गंगास्तुति
•वाल्मीकि ऋषि : इनके द्वारा रचा ' गंगाष्टक ' नामक स्तोत्र विख्यात है । संस्कृत जाननेवाले श्रद्धालु स्नानके समय इसका पाठ करते हैं। उनकी ऐसी श्रद्धा है ,
- महापुरुषोंद्वारा की गई गंगास्तुति
•वाल्मीकि ऋषि : इनके द्वारा रचा ' गंगाष्टक ' नामक स्तोत्र विख्यात है । संस्कृत जाननेवाले श्रद्धालु स्नानके समय इसका पाठ करते हैं। उनकी ऐसी श्रद्धा है ,
कि इससे गंगास्नानका फल प्राप्त होता है । '
•आद्यशंकराचार्यजी : इन्होंने गंगास्तोत्र रचा । इसमें वे कहते हैं :
वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।
अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ।।
~( श्लोक ११ )
•आद्यशंकराचार्यजी : इन्होंने गंगास्तोत्र रचा । इसमें वे कहते हैं :
वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।
अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ।।
~( श्लोक ११ )
अर्थ- आपसे दूर जाकर कुलीन राजा बनने की अपेक्षा आपके इस जल में कच्छप अथवा मत्स्य होना अथवा आपके तट पर सदैव वास करने वाला क्षुद्र रेंगने वाला प्राणी,दीन-दुर्बल चांडाल होना भी सदैव श्रेष्ठ है।
•गोस्वामी तुलसीदास जी:
इन्होंने अपनी 'कवितावली' के उत्तरकांड मे...
•गोस्वामी तुलसीदास जी:
इन्होंने अपनी 'कवितावली' के उत्तरकांड मे...
तीन छंदों में वर्णित किया है,इसमे प्रमुख रूप सा गंगा दर्शन,गंगास्नान, गंगाजल इत्यादि वर्णित है ।
#गंगा_दशहरा के शुभ अवसर पर माँ गंगा पर मेरे द्वारा लिखी गई कविता
~ शर्वाणी !
@Itishree001
@Anshulspiritual
@almightykarthik
#गंगा_दशहरा के शुभ अवसर पर माँ गंगा पर मेरे द्वारा लिखी गई कविता

~ शर्वाणी !
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